मदर सेराफिना फरोली (1853 - 1917)
मदर सेराफिना (फ्रांसिस्का फरोली) का जन्म 7 अक्टूबर, 1853 को इटली के टोसिग्नानो में हुआ था। वे श्री फ्रेडरिक और श्रीमती ओटिलिया फरोली की पहली बेटी थीं। फ्रांसिस्का बचपन से ही न केवल प्रार्थना में रुचि रखती थीं, बल्कि पवित्र साक्रामेंट में यीशु के प्रति भक्ति को विशेष स्थान देती थीं। एक बालिका के रूप में ही फ्रांसिस्का प्रार्थना के लिए बहुत समय देती थीं तथा संतों की जीवनियाँ पढ़ना पसंद करती थीं। शहीदों के जीवन से प्रेरणा पाकर मसीह के लिए शहीद होने की इच्छा भी उनके मन में उत्पन्न होने लगी। फलस्वरूप उन्होंने अपने जीवन में तीन लक्ष्य निर्धारित किए—(क) युवाओं को शिक्षा देना, (ख) मिशन क्षेत्र में कार्य करना और (ग) विश्वास के लिए शहीद हो जाना।
अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद फ्रांसिस्का के हृदय में मिशनरी बनने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हुई। उन्होंने संत फ्रांसिस के पदचिह्नों पर चलने का निर्णय लिया। उन्होंने संत एलिजाबेथ द्वारा स्थापित फ्रांसिस्कन संस्था में प्रवेश करने का निश्चय किया। जब उन्होंने इसकी जानकारी अपने पिता को दी तो वे बिल्कुल खुश नहीं हुए, बल्कि उनके निर्णय का विरोध करने लगे।
फ्रांसिस्का आँसू भरी आँखों से पवित्र साक्रामेंट के सामने रो-रोकर प्रार्थना करने लगीं कि उनके पिता का हृदय बदल जाए और उनके निर्णय को प्रभु का आशीर्वाद मिले। लेकिन पिता का हृदय कठोर ही रहा। फ्रांसिस्का के मन में अब यह संदेह उत्पन्न होने लगा कि क्या पिता की इच्छा के विरुद्ध जाना ईश्वर की इच्छा हो सकती है? तभी उनके कानों में यह वाक्य गूँजने लगा—“जो अपने माता-पिता को मुझसे ज्यादा प्यार करता है, वह मेरे योग्य नहीं।”
इसके बाद अपने प्रियजनों को छोड़कर और पिता के बिना आशीर्वाद लिए, वे 27 अक्टूबर, 1873 को 20 वर्ष की आयु में शिक्षक प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र के साथ सेंट फ्रांसिस्कन धार्मिक संस्था में शामिल हो गईं। ठीक एक वर्ष बाद वे नोविस बनीं और उन्होंने अपना नाम बदलकर यीशु की सेराफिना रख लिया।
कुछ समय बाद जेम्मा को भी लगा कि प्रभु उन्हें समर्पित जीवन के लिए बुला रहे हैं। उन्होंने भी अपने पिता को अपनी इच्छा बताई। उनकी आशा के विपरीत, पिता ने उन्हें आशीर्वाद दिया और शीघ्र ही उन्हें फोर्ली ले जाने की प्रतिज्ञा की, जहाँ सेराफिना रहती थीं।
14 सितंबर, 1875 को लगभग दो वर्ष बाद पिता और सेराफिना की भेंट हुई, जब पिता जेम्मा को उसी फ्रांसिस्कन धर्म समाज में प्रवेश कराने के लिए लेकर पहुँचे। उस दिन पिता और बड़ी बेटी ने एक-दूसरे को हृदय से गले लगाया। उनके बीच की कटुता समाप्त हो गई और पितृ प्रेम से सेराफिना का हृदय भर गया। उसी वर्ष 28 अक्टूबर को परिवार की उपस्थिति में सेराफिना ने अपने आपको पूर्ण रूप से प्रभु को समर्पित कर दिया।
4 नवंबर, 1873 को युवा फ्रांसिस्का को संत फ्रांसिस स्कूल, फोर्ली में हेडमिस्ट्रेस नियुक्त किया गया। बहुत जल्द ही उन्होंने संत फ्रांसिस स्कूल के लिए नियम तथा शिक्षकों के लिए एक हैंडबुक तैयार की। इसके बाद पवित्र आत्मा की प्रेरणा तथा फोर्ली के बिशप के निर्देशन में उन्होंने 9 सहयोगियों के साथ एक संविधान तैयार किया, जिसका आधार संत क्लारा के नियम थे।
इसी के साथ 1 मई, 1898 में फ्रांसिस्कन धर्म-समाज की एक और शाखा इटली में शुरू हुई और वह “अति पवित्र साक्रामेंट की फ्रांसिस्कन क्लारिस्ट मिशनरी संस्था” (CFMSS) के नाम से जानी जाती है। 1907 में संत पिता पायस दसवें ने इसे स्वीकृति प्रदान की।
इस संस्था की संस्थापिका पूज्या मदर सेराफिना एक महान मिशनरी शिक्षाविद् थीं। उनका सपना था कि वे यीशु के प्रेम को गरीबों और असहाय बच्चों में बाँट सकें। उनकी यह प्रबल इच्छा उस समय पूरी हुई जब स्वर्गीय आर्चबिशप माननीय डॉ. चार्ल्स जेंटिली ने मदर सेराफिना को आगरा धर्मप्रांत में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया। मदर ने इस निमंत्रण को स्वीकार किया और संस्था की स्थापना के केवल तीन वर्षों के भीतर, 3 मई, 1901 को चार धर्म-बहनों को एक अनजान देश भारत भेजा।
सन् 1912 में आगरा में एक स्कूल और एक अन्य अनाथालय खोला गया। आज उन्हीं के पदचिह्नों और सिद्धांतों पर चलते हुए सेंट विंसेंट विद्यालय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और नैतिक मूल्यों का प्रसार कर रहा है।
ईश्वर आप पर अपनी कृपा बनाए रखे!
"एक सच्चा नेता वह है जो रास्ता जानता है,
उस रास्ते पर चलता है और दूसरों को रास्ता दिखाता है।"